जय शिव हर, हर, हर, महादेव,
इस मन के कलुष सब हर लो, प्रभु जीवन पावन कर दो,
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
राग, द्वेष, ईर्ष्या माया में, मन ये बंधा फिरता है.
मोह, मान, अज्ञान के तम से, पापी नित घिरता है.
आत्म ज्ञान का तुम प्रकाश भर,इसको झिलमिल कर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
भटक रहा जंजालों में और अटक रहा भव फंदों में.
देख के देख नहीं पाता है, इसकी गिनती अंधों में.
अंतर नेत्र खोल कर भगवन, ज्योतिर्मय मन कर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
संसारी नातों की मृग-तृष्णा में दौड़ लगाता है,
भक्ति प्रेम की गंगा सतसंग, उसमें नहीं नहाता है.
ओस कणों से प्यास बुझे ना, तव प्रेमामृत भर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
है आलस्य प्रमाद भरी यह आत्मा इसे जगा दो,
स्थूल, सूक्ष्म,कारण शरीर के, रोग और दोष मिटा दो.
ज्योति-ज्योति से मिल जाए, हे सच्चिदानंद यह वर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
प्रभा तिवारी
इस मन के कलुष सब हर लो, प्रभु जीवन पावन कर दो,
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
राग, द्वेष, ईर्ष्या माया में, मन ये बंधा फिरता है.
मोह, मान, अज्ञान के तम से, पापी नित घिरता है.
आत्म ज्ञान का तुम प्रकाश भर,इसको झिलमिल कर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
भटक रहा जंजालों में और अटक रहा भव फंदों में.
देख के देख नहीं पाता है, इसकी गिनती अंधों में.
अंतर नेत्र खोल कर भगवन, ज्योतिर्मय मन कर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
संसारी नातों की मृग-तृष्णा में दौड़ लगाता है,
भक्ति प्रेम की गंगा सतसंग, उसमें नहीं नहाता है.
ओस कणों से प्यास बुझे ना, तव प्रेमामृत भर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
है आलस्य प्रमाद भरी यह आत्मा इसे जगा दो,
स्थूल, सूक्ष्म,कारण शरीर के, रोग और दोष मिटा दो.
ज्योति-ज्योति से मिल जाए, हे सच्चिदानंद यह वर दो.
जय शिव हर, हर, हर, महादेव.
प्रभा तिवारी

