इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है,
करता सदा गुमराह, बड़ी शान भरता है.
नटखट हठीला ऐसा कि, माने नहीं समझाए,
कुछ समझ भी जाए तो, फिर लौट वहीं आए.
करता है छीना झपटी, जब कुछ ज्ञान भरता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
मोड़ो तो नहीं मुड़ता, नई राह पै हल्के,
देने पड़ेंगे इसको, संयम कोड़ों से छल के.
छलिया की तरह तर्कों से बेईमान करता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
मैं हार गयी इससे, इसे तुम को दे दिया,
तुम मुझको न लौटाना, यही वादा ले लिया.
निश्चित मगन प्राणी, तेरा ध्यान धरता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
प्रभा तिवारी
करता सदा गुमराह, बड़ी शान भरता है.
नटखट हठीला ऐसा कि, माने नहीं समझाए,
कुछ समझ भी जाए तो, फिर लौट वहीं आए.
करता है छीना झपटी, जब कुछ ज्ञान भरता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
मोड़ो तो नहीं मुड़ता, नई राह पै हल्के,
देने पड़ेंगे इसको, संयम कोड़ों से छल के.
छलिया की तरह तर्कों से बेईमान करता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
मैं हार गयी इससे, इसे तुम को दे दिया,
तुम मुझको न लौटाना, यही वादा ले लिया.
निश्चित मगन प्राणी, तेरा ध्यान धरता है,
इस मन को बहुत मारो, परेशान करता है.
प्रभा तिवारी