(११)
गर्व करो मन कभी न धन का,
गौरव पद वाले कोई जन का,
शक्तियुक्त तन, रूप यौवन का,
करके इनका त्याग पाओगे,
स्थिति निश्चय ही ब्रम्हीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
धन, जन, यौवन, मान निरर्थक,
सतत चक्र बांधे दुःख वर्धक,
मम मेरा सब तज, भज सार्थक,
यह सब नाटक है माया का,
ये सब ही सोच विनाशनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
(१२)
दिवस रात फिर-फिर आते हैं,
शीत वसंत भी गहराते हैं,
बढती आयु घटा जाते हैं,
इच्छाएं कम कभी न होतीं,
और ये ही दुखदायिनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
कुछ स्थिर नहीं यहाँ जड़ता,
सब कुछ ही है सहना पडता,
मन भूत सदा रहता गड़ता,
फिर भी भविष्य की चिंता में,
मन रहता क्यों रत विकलनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
गर्व करो मन कभी न धन का,
गौरव पद वाले कोई जन का,
शक्तियुक्त तन, रूप यौवन का,
करके इनका त्याग पाओगे,
स्थिति निश्चय ही ब्रम्हीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
धन, जन, यौवन, मान निरर्थक,
सतत चक्र बांधे दुःख वर्धक,
मम मेरा सब तज, भज सार्थक,
यह सब नाटक है माया का,
ये सब ही सोच विनाशनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
(१२)
दिवस रात फिर-फिर आते हैं,
शीत वसंत भी गहराते हैं,
बढती आयु घटा जाते हैं,
इच्छाएं कम कभी न होतीं,
और ये ही दुखदायिनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.
कुछ स्थिर नहीं यहाँ जड़ता,
सब कुछ ही है सहना पडता,
मन भूत सदा रहता गड़ता,
फिर भी भविष्य की चिंता में,
मन रहता क्यों रत विकलनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.

