सोमवार, 31 जनवरी 2011

भज गोविन्दम (छठा खंड)

     (११)
गर्व करो मन कभी न धन का,
गौरव पद वाले कोई जन का,
शक्तियुक्त तन, रूप यौवन का,
करके इनका त्याग पाओगे,
स्थिति निश्चय ही ब्रम्हीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


धन, जन, यौवन, मान निरर्थक,
सतत चक्र बांधे दुःख वर्धक,
मम मेरा सब तज, भज सार्थक,
यह सब नाटक है माया का,
ये सब ही सोच विनाशनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


     (१२)
दिवस रात फिर-फिर आते हैं,
शीत वसंत भी गहराते हैं,
बढती आयु घटा जाते हैं,
इच्छाएं कम कभी न होतीं,
और ये ही दुखदायिनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


कुछ स्थिर नहीं यहाँ जड़ता,
सब कुछ ही है सहना पडता,
मन भूत सदा रहता गड़ता,
फिर भी भविष्य की चिंता में,
मन रहता क्यों रत विकलनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

भज गोविन्दम (पंचम खंड)

     (९)
सत्संग से पाते अनासक्ति,
अनासक्ति से हो माया से मुक्ति,
माया छूटते आती है भक्ति,
भक्ति से ज्ञान, ज्ञान से मोक्ष,
कह गये संत आचारणीय,
भज गोविन्दम, भाव तारणीय.


सांसारिक जन से सावधान,
कर भले की सत् पहचान,
सत् जन से मिले शान्ति महान,
और वे ही तुम्हें बचायेंगे,
दे कर शिक्षा अनुसारणीय,
भज गोविन्दम, भाव तारणीय.


     (१०)
वृद्धत्व में काम विकार कहाँ?
सूखी नदिया जल धार कहाँ?
दारिद्रय में अनुचर चार कहाँ,
ऐसे ही तत्व ज्ञानी के मन
संसार कहाँ रहे स्मरणीय,
भज गोविन्दम, भाव तारणीय.

कारण समाप्त हो जाने पर,
परिणाम नहीं आता है पसर,
पानी बिन कैसे उठे लहर,
जब भोर हुई सूरज उगा,
तब रात कहाँ अन्धकारनीय,
भज गोविन्दम, भाव तारणीय.





बुधवार, 26 जनवरी 2011

भज-गोविन्दम ( चतुर्थ खंड)

     (७)
बालकपन में खेला कूदा,
यौवन की मदिरा में डूबा,
वृद्धापन आया तो सूझा,
सब पाया और सभी खोया,
नहीं भजा नाम जो सुमरनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


तीनों ही पन में फंसा जाल,
इन्द्रिय लिप्सा का ये जंजाल,
प्रभु भजता तो होता निकाल,
वैतरणी न तरना पडता,
बस ब्रह्म ही है उद्धारणीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


     (८)
पत्नी है कौन ? और कौन पुत्र,
ये जग के नाते अति विचित्र ?
तुम कौन ? कहाँ से आये मित्र ?
सोचा है कभी ? अब तो सोचो,
ये ही है तथ्य विचारणीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


कुछ सोचो करो कुछ जिज्ञासा,
मिल पायेगी कुछ परिभाषा,
नश्वरों से करते क्यों आशा,
मन का दोहन कर पाओगे,
तुम सत्य सार अनुकारणीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.





रविवार, 23 जनवरी 2011

भज-गोविन्दम ( तृतीय खंड)

            (५)
जब तक धन अर्जन शक्ति है,
तब तक जन स्नेहासक्ति है,
अपना कहता हर व्यक्ति है,
अक्षम होने पर सब छोड़ें,
कोई भी नहीं सह कारनीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


जब जर्जर तन हो जाओगे,
तब तुम बूढे कहलाओगे,
तब किसी से ना कुछ पाओगे,
कोई सम्बन्ध रखेगा नहीं,
कहलाओगे बस अवांछनीय, 
भज गोविन्दम भवतारणीय.


          (६)
जब तक शरीर में प्राण पवन,
तब तक ही नाते स्नेहीजन,
तब तक अपनों का अपनापन,
जब गए प्राण तब गया सभी,
देखो माया मन हारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


है सारहीन मिथ्यानुराग,
तज दे बंधन मन भाग भाग,
संबंधों से हो वीतराग,
यह राग ही बंधन कारक है,
क्या सोच रहा मन मारनीय,
जब गोविन्दम भवतारणीय.

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

भज-गोविन्दम ( द्वितीय खंड)

          (३)
छिति, जल, पावक, गगन, समीरा,
पंच जनित यह अधम सरीरा.
यह समझाई तुलसी बीरा,
इनका मोह सदा दुखदाई,
वधिक समान है मारनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


आकर्षण अवयव अंगों का,
स्वाभाविक है जन संगों का,
अनुशासित हो रस रंगों का,
संयमधारी बन रहो तो सुख,
विपरीत हुआ दुख असहनीय,
भज गोविन्दम, भव तारणीय.


          (४)
जिस तरह कमल के पल्लव पर,
जल बिंदु ठहरते है क्षण भर,
अस्तित्व यही उनका पलभर,
जीवन भी अनिश्चित ऐसा है,
ये बात नहीं है विसारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


जल में कमल जन्म लेता है,
जल से ही पोषण होता है,
जल निवास जीवन खोता है,
और एक दिन जल में ही विनाश.
मन मूरख बात यह सोचनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

बुधवार, 19 जनवरी 2011

भज-गोविन्दम (प्रथम खंड)- श्री शंकराचार्य विरचित भज-गोविन्दम् का हिंदी में भाव पद्यानुवाद

भगवान श्री शंकराचार्य विरचित भज-गोविन्दम् का हिंदी में भाव पद्यानुवाद क्रमशः छोटे छोटे भागों में आपको प्रस्तुत करूंगी.


          (१)
भज गोविन्दम भव तारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


जब म्रत्यु निकट आजायेगी,
कोई युक्ति काम न आयेगी.
सब उपलब्धि छूट जायेगी,
मूरख यह बात विचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


          (२)
धन, मान और सुख के वैभव,
संबंधी और ये कुल कैरव,
आशा, तृष्णा औ भ्रान्ति रौरव,
हे मूर्ख प्राप्ति की इच्छा ही,
सारे दुखों की कारणीय ,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


सत्चिंतन सद्विचार लेकर,
सद्भावना  का आधार देकर,
सत्कर्मों में चित को देकर,
संतोष प्राप्त कर पाओगे,
ये ही मग है अनुसारनीय ,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

श्री गुरुवेनमः क्रपायाचनी

श्री गुरु चरण का ध्यान करि, वानी, गणेश मनाय,
भज-गोविन्दम सरल्ररूपकरि, लिखूं अनुवाद बनाय.

श्री आदिशंकराचार्य के द्वारा रचित ये पद्य,
संस्कृत से हिंदी सुगम कर लिखती मैं अद्य.

चिन्मय मिशन के संतसन्, प्रवचन सुन सत्संग,
जो  समझा सो लिख रही, कर भरोस अंतरंग.

यह प्रयास होवे सफल, कृपा गुरु, गणपत व वानी,
और मेरे आराध्य प्रिय. कृपा महेश भवानी.

श्री गुरुवंदना

          गुरु वन्दनीय, अभिनन्दनीय
          गुरु तारण तरण, स्वयं तरणी.
पतवार स्वयं, कर कंजनीय. गुरुवंदनीय..........


          गुरु रामा है, गुरु क्रष्णू हैं,
          गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं.
गुरु ही शिव हैं आनंदनीय. गुरु वन्दनीय ..........


          गुरु महिमा अमित अपार शक्ति,
          पाइये अपने  विश्वास भक्ति.
गुरु मन अति कोमल कमनीय. गुरु वन्दनीय......


          छल, कपट, दंभ, पाखण्ड तजकर,
          पाओगे गुरु की कृपा सुखकर.
गुरु दुर्गुण, दोष निकंदनीय. गुरु वन्दनीय...........


           सर्वस्व समर्पण भावना हो,
           भक्ति की केवल कामना लो.
गुरु पाओगे अकथनीय. गुरु वन्दनीय, अभिनंदनीय.