शनिवार, 14 अप्रैल 2012

पहचानूँ कैसे हे श्री राम ?

मैं तो बनी दीवानी पहचानूँ कैसे हे श्री राम.


चिंतन सुधरे न भाव ही आवे,
जग मिथ्या ही मोहे सतावे,
मैं तो बड़ी अनजानी, विचारूं कैसे हे श्री राम.


जप, तप साधन बन नहिं आवे,
अंतर ज्ञान समझ नहिं पावे,
मोह, माया में अन्धरानी, निहारूं कैसे हे श्री राम.


जितना चाहूँ कर ना पाऊँ,
सोच सोच मन में घबराऊँ, 
मूक बनी हेरानी, पुकारूं कैसे हे श्री राम.


तुम करुणा निधि अन्तर्यामी,
क्षमा, दया के सागर स्वामी,
आशा यही हिरदै में समानी, रिझाऊँ कैसे हे श्री राम.


प्रभा तिवारी