शनिवार, 5 नवंबर 2011

तुलसी आरती

(कार्तिक महीने में तुलसी विवाह के उपलक्ष में मीरा का एक भजन सादर समर्पित)

तुलसी महारानी नमो नमो,
हरि की पटरानी नमो नमो.

धन तुलसी पूरन तप कीना,
सालिगराम भाई पटरानी.

धूप दीप नैवेद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा वर्षानी.

छप्पन भोग धरे प्रभु आगे,
बिन तुलसी हरि एक न मानी.

नारद शारद शीश नवावें,
ध्यान धरें सुर मुनि विज्ञानी.

मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
भक्तिदान दीजो वरदानी.


गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

प्रभु से अरज़ी

नाथ देरी दया में नहीं कीजिये,
बात बनकर भी मेरी बिगड़ जायगी.
लोग मुझ पर हंसेगे, और कुछ तुम पे भी,
जो दया में कमी थोड़ी पड़ जायगी.


मेरा विश्वास है जो, वह उनका नहीं,
उनको पर्वत है जो, तुमको तिनका नहीं.
ध्यान यदि न दिया दासी की अर्ज़ पर,
मेरी किश्ती किनारे से लड़ जायगी.


अपनी महिमा दयालू दिखा दीजिये,
इतनी किरपा अब दासी पै कर दीजिये.
लाज से सिर मुझे गर झुकाना पड़ा,
बात तब वह तुम्हारे पै जड़ जायगी.




तुमको अपना जगत को बताया मैंने,
दया का अपनापन भी जताया मैंने.
सामना कैसे उनका मैं कर पाऊँगी,
अपनापन न मिला दासी गढ़ जायगी.



नाथ देरी दया में नहीं कीजिये,
बात बनकर भी मेरी बिगड़ जायगी.

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

अनुभूति

आ गयी अब जीवन में शाम,
करना चाहूं अब विश्राम,
करके किरपा अपने धाम,
आने दो आना है.

समझ पड़ा झूठा संसार,
झूठे नाते झूठा प्यार,
पाया सब झूठा व्यवहार,
भुलाने दो भुलाना है.

झूठ से जग बौराया है,
सत्य को झूठ बताया है,
हित करके दुःख पाया है,
छुटाने दो छुटाना है.

अपनों से कोई आस नहीं,
किसी का भी विश्वास नहीं,
यह जग मुझको रास नहीं,
मिटाने दो मिटाना है.

जग की ओर मन अब न लगे,
अपना सा अब कुछ न लगे,
अब तुम अपना लो,  
श्री राम गाने दो गाना है.

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

जय जगदम्बे

जयो-जयो माँ जगदम्बे 
दुःख विनाशिनी, 
तुम सुखकारिणी,
मंगल मूरति जय अम्बे.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

जय जय हे महिषासुरमर्दिनी , 
दंभ कपर्दिनी शैल सुते.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

आदी मध्यांत रहित भवानी,
सारे सुर तव चरण पड़े.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

सर्व समर्थ सर्वगत देवी 
सर्वमयी तुम्हें संत कहे.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

सत् चिंतन सद् भाव भरे उर,
सद् विचार दासन्ह में धरे.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

जब लगि जियूँ चरण न छोडूँ,
मैं तेरी कहलाऊं अम्बे.
जयो-जयो माँ जगदम्बे.

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

कामना निवेदन

क्षणिक दया की दृष्टि नाथ अगर हो जाए।
तुम्हारे प्रेम में हे नाथ मन ये खो जाए ॥
विकार हों दूर मन के, ये पूर्ण निर्मल हो। 
हो तृप्त आत्मा, चरणों में तेरे सो जाए॥

हो ध्यान मेरा सदा आंतरिक उजाला पर,
रहे दिन रात तेरा नाम श्वास माला पर। 
जगत को भूले तेरे स्मरण में खो जाए,
क्षणिक दया की दृष्टि नाथ अगर हो जाए।। 

पूर्ण विश्वास से ये मन तुम्ही से आशा रखे,
भटकना छोड़े सदा तुमको अपने पास लखे। 
तुझे अपना कहे और तेरा अपना हो जाए,
क्षणिक दया की दृष्टि नाथ अगर हो जाए।। 


मंगलवार, 13 सितंबर 2011

मनोकामना

वह शक्ति मुझे दो दयानिधे, कुछ सेवा जगत की कर पाऊं,
संसार कुमति से नित्य दुखी, भावों से सुमति उर भर पाऊं.
                 बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.


                 सदा ही काम आऊँ जन के दुःख में,
                 जो चाहें उनको बन जाऊं सहारा.
                 बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.


                 सभी जन मुझसे सुख पायें सदा ही,
                 न दुःख पाए कभी कोई मेरे द्वारा.
                 
बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.



                 क्षमा, प्रेम इस उर में इतना भरो प्रभु,
                 लुटाऊँ जगत को बन जननी उदारा.
                 बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.


                 बना दो स्तिथि-प्रग्य अब इस ह्रदय को,
                 कि अपना ही सा लागे संसार सारा.
                 बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.


                 चला दो वही राह तुम तक जो आती,
                 कि आना पड़े ना जगत में दुबारा.
                 बड़ी आशा से नाथ तुमको पुकारा.

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

तुम्हारे चरण में

तुम्हारे चरण मैं आकर, मैं जग को भूल भूल जाती हूँ,
   भटकते भोगते मन में, यहीं पर शान्ति पाती हूँ.

सदा बांधे रहो हे नाथ, निज चरणों में ही मुझको,
कि इनसे दूर हो जग में, सदा ही भ्रान्ति पाती हूँ.

सभी नाते व सुख वैभव, लगे संताप दायी ही,
तुम्हारे ध्यान से सामीप्य में विश्रांति पाती हूँ.

रविवार, 28 अगस्त 2011

जीते हैं कोटि हजारे

जग बोल रहा जयकारे,
दिन फिर जायेंगे हमारे.
भारत भूमि पर लखो आज,
जीते हैं कोटि हजारे.

अब भ्रष्टाचार मिटेगा,
और सद आचार लुटेगा.
बरसेगी शान्ति भूमि पर,
कष्टों के बुझेंगे अंगारे,
जीते हैं कोटि हजारे.

एक देवदूत लो आया,
उसने सबको समझाया.
मत उसका सबको भाया,
क्या हैं अधिकार हमारे,
जीते हैं कोटि हजारे.

जनता ने बहुत सहा है,
पर ये ही सदा कहा है.
अन्याय न रहने देंगे,
बदलेंगे कटु नियम सारे,
जीते हैं कोटि हजारे.

इस देश का दूजा गांधी,
उसने चलायी है आंधी.
भूल के खुदी को, सब भारतीय
कहने लगे खुद को हजारे,
जीते हैं कोटि हजारे.

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

मन चिंतन प्रार्थना

यही चिंतन हो नाथ अगले सवेरे,
रहें मन को प्रति पल ही सद्भाव घेरे.

कि हर पल हो चिंतन तुम्हारा ह्रदय में,
मन भी सतत हो तुम्हारे विषय में.
सुमति मन रहे, और सत्संग पाऊं,
फिरें श्वास माला में नामों के फेरे.

कि मिथ्या औ' सत का सदा भान हो,
उचित और अनुचित का भी ज्ञान हो.
क्षमा, प्रेम, करुणा तजे न ह्रदय को,
सहज सेवा में रत रहें अंग मेरे.

करूं कर्म निष्काम, जागृत रहूँ मैं,
कि रह कर भी जग में, विलग ही रहूँ मैं.
कभी लक्ष्य से अपने भटकूँ न गुरुवर,
सतत द्रष्टि तुमरी रहे मुझको हेरे.

यही चिंतन हो नाथ अगले सवेरे,
रहे मन को प्रति पल ही सद्भाव घेरे.



रविवार, 21 अगस्त 2011

श्री कृष्ण का बाल रूप

वनमाल हिए विच शोभित है,
           अरु माथे पै मोतिन की अवली.
अधरारुण बीच दिखें दँतियाँ,
           चपल द्युति सी, मानो लागै भली.
कंचन किंकिणिया कटि सोहे,
           अरु पैंजनियां पग बाजे भली.
यशुदा ढिंग शोभित 'श्याम लला',
           पहिरे रंग पीत रंगी झंगुली.

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

अभिलाषा

तेरी पूजा प्रभु जग के हरेक काम में हो,
तेरा दर्शन प्रभु जग के हर नाम में हो.

बना रहे सतत ही सत् चिंतन,
और सद्भावना निसृत निस दिन.
नाथ सत्कर्म ही करने का मेरे ध्यान में हो,
तेरी पूजा प्रभु जग के हरेक काम में हो.

नित्य बढती रहे श्रद्धा भक्ति,
लगे परमार्थ में सदा शक्ति.
जो किनारे पे लगा दे वही मग ज्ञान में हो,
तेरी पूजा प्रभु जग के हरेक काम में हो.

क्षमा, दया व धैर्य इतना दो,
त्याग की भावना भी उतनी हो.
डूब जाए ये जगत इतना 'प्रेम' दान में दो,
तेरी पूजा प्रभु जग के हरेक काम में हो.

सदा सहज, सरल मन, मेरा निरहंकार रहे,
तत्व दर्शन प्रकाश, मेरे दशम द्वार रहे.
आत्मा उसमें रमे मोह अन्धकार न हो,
तेरी पूजा प्रभु जग के हरेक काम में हो.


गुरुवार, 11 अगस्त 2011

मन को सलाह

मगन रहो मनवा, राम गुन गायके,
क्या पाओगे जगत को रिझाय के.

जिसको मानोगे इस जग में अपना,
बेगाना वो ही लगेगा, ज्यूँ सपना,
दुःख ही पाओगे ममता लगाय के.
मगन रहो मनवा, राम गुन गाय के.

ये जग के नाते झूठे हैं सारे,
ठोक बजा कर परख ले प्यारे,
इनमें न रम तू गुरु को विहाय के.
मगन रहो मनवा, राम गुन गाय के.

जिसने नातों को अपना माना,
उसने पाए हैं दुःख ही नाना,
अंत गया है वही पछताय के.
मगन रहो मनवा, राम गुन गाय के.

साथ रहेगा नाम, जो है सांचा,
सुख भी नाम से मिलत मनराँचा,
उसको सुमर ले, जगत विसराय के.
मगन रहो मनवा, राम गुन  गाय के.

सोमवार, 1 अगस्त 2011

पावन-सावन

रिम झिम - रिम झिम, पडत फुहार चहुँ,
मलय समीर बहै, समय सुहावन है.
छाये घनश्याम देख, टेरत मयूर वृन्द,
आओ-आओ श्याम, छोड़ें तान मन भावन है.
एक सुतिथि में बांधे, बंधुओं को राखी हम,
इस प्रिय मास का, शुभ नाम सावन है.
राखो लाज हमरी, हमारे रक्षाबंधन की,
बन्धु यह सावन, पुनीत और पावन है.

शनिवार, 16 जुलाई 2011

आरती श्री गुरुवर की

                            आरती कीजे श्री गुरुवर की, तारण-तरण जनम दुःख-हर की .

    जो भी गुरु की शरण में आया, उसने जीवन सफल बनाया,
                                                       जग के दुःख संग, भव दुःख-हर की......


   सत्चिंतन -  सद्भाव भरें मन, सत्कर्मों को प्रेरित करें मन,
                                                         रोग-दोष संशय भ्रम-हर की........


   अंत  समय जीवन का आवे,  गुरु ही भव से पार लगावे,
                                                          मृत्यु से मन को  निर्भय-कर की.........
 
                   
                                         आरती कीजे श्री गुरुवर की,  तारण-तरण जनम दुःख-हर की !
                                

               
                                             

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

माँ की याद

माँ याद तुम्हारी आते ही,
जल बरसाने लगते हैं नयन.
रसना भी मूक हो जाती है,
मुख अन्दर घुल जाते हैं बयन.

तुम पास हो या सुदूर कहीं,
कुछ भी कर पाती नहीं चयन.
आशीष सदां पाती हूँ साथ,
सुखदे ! माँ तुमको कोटि नमन.

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आरती

वन्दे गौरीशं शिव वन्दे गौरीशं,
त्रिगुणातीत मनादिमनन्तं जगदीशम,
ओम हर, हर हर महादेव.

श्री कैलाश निवासं, पंकज मुख नयनं.
शिव पंकज मुख नयनं,
शशिधर मौलिम शिवदं,
ताप त्रय शमनम.
ओम हर, हर हर महादेव.

अखंडैक रस रूपं,
जन मन सुख करणं,
शिव जन मन सुख करणं.
सुर पूजित पद पीठं,
कृत भस्मावरणम .
ओम हर, हर हर महादेव.

शरतचन्द्र गौरी छवि, मन्मथ मदहरणम,
शिव मन्मथ मदहरणम,
गौरीशंकर नाथं,
गुण गायक शरणम.
ओम हर, हर हर महादेव.   


(यह आरती मेरे स्व. पितामह श्री गौरीशंकर जी मिश्र के द्वारा रचित है)

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (अंतिम खंड)

     (२८)
सुख प्राप्ति को करते नाना भोग,
उससे पाते हैं विभिन्न रोग,
सत्संग का पाते नहीं सुयोग,
अंतिम म्रत्यु है शाश्वत,
फिर भी बनते पापाचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

यह खेल है वासना माया का,
मानव इसमें भरमाया जा,
करे अनुचित कर्म ठगाया सा,
तजता नहि पापाचार मूर्ख,
यद्यपि म्रत्यु है धारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

     (२९)
धन मूल सभी दुखों का है,
बस क्षणिक प्रदाई सुखों का है,
स्वजनों से भी डर आतंकों का है,
सर्वत्र यही रीती दिखती,
धन संग्रह इच्छा निवारणीय,

भज गोविन्दम भव तारणीय.

अत्याधिक धन ही दुखदाई है,
बस पल भर का सुखदाई है,
संतति को शत्रु बनाई है,
सब जग में दिखाई यही पड़े,
तनि सोच समझ ये विचारणीय,

भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (३०)
कर प्राणायाम और प्रत्याहार,
रख अपने मन में शुभ विचार,
जप लीन समाधि का हो आधार,
कर यत्न और बल पूर्वक तू,
ये कार्य ही है अभ्यासनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

श्वासों से नियंत्रण हो मन पर,
इन्द्रिय निग्रह भी करो तन पर,
फिर अनुशासन जप साधन पर,
कर ध्यान निरंतर अंतर में,
विस्मृति हो जाय समाधिनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (३१)
हे श्री गुरु चरण कमल के भक्त,
तुम हो सकते हो शीघ्र मुक्त,
तुम रह न सकोगे बंधन युक्त,
गुरु कृपा से निज अंतस में तुम,
देखोगे देव ह्रद्वासनीय ,

भज गोविन्दम भव तारणीय.


हो सदगुरू पूर्ण समर्पित मन,
उसे बाँध सकेंगे न भव बंधन,
पायेगा अवश्य मुक्ति वह जन,
चिदाकाश प्रकाश को पाएगा,
यह द्रश्य ही सच्चिदानन्दनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


              दोहा 
श्री गुरुकृपा प्रसाद से, पूर्ण हुए सब पद्य.
माँ शारदा, श्री गणेश की कृपा रही अनवद्य. 

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (दशम खंड)

     (२४)
तुझ से मुझ में है एक तत्व,
मत हो अधीर वह है अव्यक्त,
हर स्तिथि में, रखो तुम समत्व,
यदि तत्व से मिलना चाहते हो,
समता का भाव सराहनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


यदि पाना चाहो संसिद्धि,
पहले करलो तुम सम बुद्धि,
संदेह त्याग, अनुभव वृद्धी,
अनेकत्व तजो हर स्तिथि में,
है ज्ञान मार्ग विश्वस्यनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (२५)
सुत-बन्धु हों या हों शत्रु-मित्र,
विग्रह कर नष्ट न कर चरित्र,
सब में ही स्वयं को लख सर्वत्र,
अज्ञान में दिखते सभी भिन्न,
और ज्ञान एकत्व उभारनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


ज्यों अंग शरीर के अलग अलग,
पर कभी न रहते स्वयं विलग,
सम्बन्ध सभी का सदा सजग,
कांटे से सब को समान कष्ट,
पर पीड़ा ह्रदय विदारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (२६)
साधक अंतस से झगड़ता है,
मन को गुरुज्ञान रगड़ता है,
दुर्गुण तजने चल पड़ता है,
बचने यमलोक का बन्दीपन,
सोअहम हे निर्द्वंदनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


तज चार विकार बाहरी मन,
ह्रदयंगम करके आत्मापन,
फिर परम सत्य का कर दर्शन,
सब में ही स्वयं को लखता है,
वह साधक सामंजस्यनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (२७)
गीता और विष्णु सहस्त्रनाम,
मन में श्री विष्णु का सतत नाम,
दुखी, दीन जनों को धन का दान,
जीवन की नियमित अर्चा  में, 
उपनिषदसूत्र  आचरणनीय,
 भज गोविन्दम भव तारणीय.


गाये गीता भजे विष्णुनाम,
उसका ही उर में सतत ध्यान,
सत्संग करे हितकारी जान, 
आध्यात्मिक कर्म करे साधक,
सो जन मन ही सत्संगनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (नवम् खंड)

     (20)
जिसने ध्यायी  भगवदगीता,
थोडा सा गंगाजल पीता,
इक समय मुरारि पूजा कीता,
वह रह सकता यम से निशंक,
उपनिषदसार यह प्रमाणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


भगवदगीता जो गाता है,
गंगाजल पान कराता है,
जिसको सत्संग ही भाता है,
ये तीनों आत्मानंद दायी,
दुःख रूपी यम निस्तारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

     (२१)
जीवन पाना और फिर मरना,
माँ उदारांतर में शयन करना,
दुस्तर है पुनि-पुनि ये भरना,
इस आवागमन से हे मुरारि,
करि कृपापार तुम उवारणीय,

भज गोविन्दम भवतारणीय.



इच्छाएं खेल खिलाती हैं,
अहंताएं नाच नचाती हैं,
शासक सा आदेश चलाती हैं,
इनसे छुटकारा दिलाने को,
बस है मुरारि उद्धारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

     (२२)
योगी गुदड़ीवाला जो है,
गुण दोष से रहित जीव सो है,
मन अंतर से रमता वो है,
वह बालक सम या विक्षिप्त के सम,
संसार के लिए दर्शनीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

बालक सम सरल भाववर्णित,
हो प्यार, घ्रणा या क्रोध क्षणिक,
उसको नहीं जकडे यथा धनिक,
गत भूल सतत रहे वर्त्तमान,
योगीचित वह आदर्शनीय,

भज गोविन्दम भवतारणीय. 

     (२३)

तुम और में कौन ? कहाँ से आये ?
माँ, पिता कौन  ? कहाँ से पाए ?
इनका उत्तर को दिलवाए,
सम्पूर्ण विश्व को स्वप्न समझ,
त्यागो, हे तत्व जिग्यासनीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

आया कहाँ से कहाँ जाना है,
क्या लक्ष्य मेरा क्या पाना है,
त्यज भाव कौन ? क्या जगाना है,
कर आत्म निरीक्षण सोचो तो,
यह सोच ही बंध निवारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (अष्ठम खंड)

     (१६)
आगे अग्नी सूरज पीछे ,
रात्रि में ठण्ड से तन छीजे,
भिक्षा केवल कर में लीजे,
तरु तर निवास है फिर भी,
आशा पास से नहि निस्तारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


संभव पाखंडी रागी हो,
या जिज्ञासु स्वत्यागी हो,
धन वैभव त्याग का भागी हो,
यदि आकांक्षा का त्याग नहीं,
कहलायेगा मिथ्याचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (१७)
कोई तीर्थ करे गंगासागर,
व्रत पालन, दान स्वर्ण गागर,
भौतिक विद्याओं का नागर,
यदि ज्ञान प्राप्त कर सका नहीं,
तो मुक्ति नहीं उसे प्राप्तनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


तीरथ करना अति सुन्दर है,
व्रत दान भी इसके अन्दर है,
अध्ययन भी बड़ा समंदर है,
पर ये साधन है साध्य नहीं,
बिन ज्ञान मुक्ति नहीं लब्धनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

     (१८)
मंदिर तरुतल करे निवासा,
करे भूमि पर शयन सत्रासा,
त्याग सभी सुख, क्षुधा पिपासा,
ऐसा विरागी पा सकता ,
है सच्चा सुख अनवर्चनीय,

भज गोविन्दम भव तारणीय.

सब सुखी परस्पर को लखते ,
धन वैभव के पीछे भगते,
मन की तह को न परख सकते,
वैराग्य जनित सुख जो जाना,
आत्मानंद पाया अकथनीय ,

भज गोविन्दम भव तारणीय.

     (१९) 
या तो मन भोग में रहे लीन,
या योग नीर का बने मीन,
एकांकी अथवा समाजयीन,
मन ब्रह्मलीन हो चूका जिसका,
वह सतत रहे आनंदनीय ,

भज गोविन्दम भव तारणीय.

चाहे रहले एकांतवास ,
चाहे संग रहले बड़े समाज,
जिसका मन द्वय के नहीं साथ ,
वह तत्व का ज्ञानी कहीं रहे,
सुख दुःख से विलग पर कल्पनीय ,

भज गोविन्दम भव तारणीय.