(२४)
तुझ से मुझ में है एक तत्व,
मत हो अधीर वह है अव्यक्त,
हर स्तिथि में, रखो तुम समत्व,
यदि तत्व से मिलना चाहते हो,
समता का भाव सराहनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
यदि पाना चाहो संसिद्धि,
पहले करलो तुम सम बुद्धि,
संदेह त्याग, अनुभव वृद्धी,
अनेकत्व तजो हर स्तिथि में,
है ज्ञान मार्ग विश्वस्यनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(२५)
सुत-बन्धु हों या हों शत्रु-मित्र,
विग्रह कर नष्ट न कर चरित्र,
सब में ही स्वयं को लख सर्वत्र,
अज्ञान में दिखते सभी भिन्न,
और ज्ञान एकत्व उभारनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
ज्यों अंग शरीर के अलग अलग,
पर कभी न रहते स्वयं विलग,
सम्बन्ध सभी का सदा सजग,
कांटे से सब को समान कष्ट,
पर पीड़ा ह्रदय विदारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(२६)
साधक अंतस से झगड़ता है,
मन को गुरुज्ञान रगड़ता है,
दुर्गुण तजने चल पड़ता है,
बचने यमलोक का बन्दीपन,
सोअहम हे निर्द्वंदनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
तज चार विकार बाहरी मन,
ह्रदयंगम करके आत्मापन,
फिर परम सत्य का कर दर्शन,
सब में ही स्वयं को लखता है,
वह साधक सामंजस्यनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(२७)
गीता और विष्णु सहस्त्रनाम,
मन में श्री विष्णु का सतत नाम,
दुखी, दीन जनों को धन का दान,
जीवन की नियमित अर्चा में,
उपनिषदसूत्र आचरणनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
गाये गीता भजे विष्णुनाम,
उसका ही उर में सतत ध्यान,
सत्संग करे हितकारी जान,
आध्यात्मिक कर्म करे साधक,
सो जन मन ही सत्संगनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.