रविवार, 21 अक्टूबर 2012

माँ जगजननी मेरी माँ

जगत के लिये मुझको मुश्किल समझना,
    मगर जग की जननी मुझे जानती है.

नहीं जानूं भक्ति, न साधन न शक्ति,
भरी दोष-गुण मय, जगत में आसक्ति.
मगर उनकी हूँ, जो भी हूँ यह है निश्चय,
इसी से तो वह अपना पन मानती है.

मैं करती हूँ भूलें, वह करती क्षमा हैं,
ये अपराधी मन मेरा, उनमें रमा है.
नहीं पातकी मुझसी, उनसी पापध्नी,
कि वे इस वचन को सदा ध्यानती है.

दिखाती दया की महिमा वे सदा ही,
दयामयि स्वरूपा न रूठें कदा ही.
मैं दासी हूँ उनकी, अनेकों जनम की,
मगर प्यार से बेटी वो मानतीं हैं.

प्रभा तिवारी 

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