बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (नवम् खंड)

     (20)
जिसने ध्यायी  भगवदगीता,
थोडा सा गंगाजल पीता,
इक समय मुरारि पूजा कीता,
वह रह सकता यम से निशंक,
उपनिषदसार यह प्रमाणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


भगवदगीता जो गाता है,
गंगाजल पान कराता है,
जिसको सत्संग ही भाता है,
ये तीनों आत्मानंद दायी,
दुःख रूपी यम निस्तारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

     (२१)
जीवन पाना और फिर मरना,
माँ उदारांतर में शयन करना,
दुस्तर है पुनि-पुनि ये भरना,
इस आवागमन से हे मुरारि,
करि कृपापार तुम उवारणीय,

भज गोविन्दम भवतारणीय.



इच्छाएं खेल खिलाती हैं,
अहंताएं नाच नचाती हैं,
शासक सा आदेश चलाती हैं,
इनसे छुटकारा दिलाने को,
बस है मुरारि उद्धारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

     (२२)
योगी गुदड़ीवाला जो है,
गुण दोष से रहित जीव सो है,
मन अंतर से रमता वो है,
वह बालक सम या विक्षिप्त के सम,
संसार के लिए दर्शनीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

बालक सम सरल भाववर्णित,
हो प्यार, घ्रणा या क्रोध क्षणिक,
उसको नहीं जकडे यथा धनिक,
गत भूल सतत रहे वर्त्तमान,
योगीचित वह आदर्शनीय,

भज गोविन्दम भवतारणीय. 

     (२३)

तुम और में कौन ? कहाँ से आये ?
माँ, पिता कौन  ? कहाँ से पाए ?
इनका उत्तर को दिलवाए,
सम्पूर्ण विश्व को स्वप्न समझ,
त्यागो, हे तत्व जिग्यासनीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.

आया कहाँ से कहाँ जाना है,
क्या लक्ष्य मेरा क्या पाना है,
त्यज भाव कौन ? क्या जगाना है,
कर आत्म निरीक्षण सोचो तो,
यह सोच ही बंध निवारणीय,
भज गोविन्दम भवतारणीय.


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