बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

भज गोविन्दम (सप्तम खंड)

     (१३)
स्त्री, धन, वैभव की चिन्ता,
चिन्ता से कुछ भी नहीं बनता,
क्या तेरा नहीं ये जग नियन्ता,
भव पार हेतु सत्संग की नौका,
ही है बस इक तारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


चिन्ता से होती शक्ति क्षीण,
आसक्ति बनाती मन मलीन,
स्थिति हो जाती दीन हीन,
निर्बल का विनाश अवश्य ही है,
सो ये ही बात विचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


     (१४)
कोई बने महात्मा जटा बढ़ा,
कोई मुंडित सर कटा लटा,
कोई धारक काषाय पटा,
ये सभी मूर्ख बहरूपिये हैं,
केवल ये उदर के पोषणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


तन, मन में भरे आलस प्रमाद,
पाना चाहे इच्छित प्रसाद,
फैलाते जग में स्वार्थ वाद,
दुराचारी, अनैतिक और असभ्य,
कहलाते सब को पूजनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

     (१५)

होगये क्षीण सब अंग जभी,
और केश, श्वेत होगये सभी,
कर गए किनारा दन्त सभी,
लकड़ी का सहारा ले गठरी,
चलता फिर भी मन कामनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.


कामना करो जब तक है शक्ति,
धीरे धीरे छोडो आसक्ति,
मन अन्दर भरते रहो भक्ति,
अंततः तो सब छूटेगा,
अभ्यास करो व्यवहारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.

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