(२८)
सुख प्राप्ति को करते नाना भोग,
उससे पाते हैं विभिन्न रोग,
सत्संग का पाते नहीं सुयोग,
अंतिम म्रत्यु है शाश्वत,
फिर भी बनते पापाचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
यह खेल है वासना माया का,
मानव इसमें भरमाया जा,
करे अनुचित कर्म ठगाया सा,
तजता नहि पापाचार मूर्ख,
यद्यपि म्रत्यु है धारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(२९)
धन मूल सभी दुखों का है,
बस क्षणिक प्रदाई सुखों का है,
स्वजनों से भी डर आतंकों का है,
सर्वत्र यही रीती दिखती,
धन संग्रह इच्छा निवारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
अत्याधिक धन ही दुखदाई है,
बस पल भर का सुखदाई है,
संतति को शत्रु बनाई है,
सब जग में दिखाई यही पड़े,
तनि सोच समझ ये विचारणीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(३०)
कर प्राणायाम और प्रत्याहार,
रख अपने मन में शुभ विचार,
जप लीन समाधि का हो आधार,
कर यत्न और बल पूर्वक तू,
ये कार्य ही है अभ्यासनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
श्वासों से नियंत्रण हो मन पर,
इन्द्रिय निग्रह भी करो तन पर,
फिर अनुशासन जप साधन पर,
कर ध्यान निरंतर अंतर में,
विस्मृति हो जाय समाधिनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
(३१)
हे श्री गुरु चरण कमल के भक्त,
तुम हो सकते हो शीघ्र मुक्त,
तुम रह न सकोगे बंधन युक्त,
गुरु कृपा से निज अंतस में तुम,
देखोगे देव ह्रद्वासनीय ,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
हो सदगुरू पूर्ण समर्पित मन,
उसे बाँध सकेंगे न भव बंधन,
पायेगा अवश्य मुक्ति वह जन,
चिदाकाश प्रकाश को पाएगा,
यह द्रश्य ही सच्चिदानन्दनीय,
भज गोविन्दम भव तारणीय.
दोहा
श्री गुरुकृपा प्रसाद से, पूर्ण हुए सब पद्य.
माँ शारदा, श्री गणेश की कृपा रही अनवद्य.
प्रभा जी .. बहुत सुन्दर हैं ये भजगोविन्दम का जाप ... और उन पर आपकी यह प्रस्तुति ... आपका आभार ... आपका ब्लॉग और रचना शुक्रवार को चर्चा मंच पर होगा ... आपका धन्यवाद
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